इस सप्ताह की सुर्खियां: बीकानेेर कांग्रेस के लिए अलार्मिंग था पांच अप्रेल, भाटी की प्रेशर-पॉलिटिक्स, युद्ध ने बढ़ाई महंगाई
इस सप्ताह की सुर्खियां
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हैलो बीकानेर। पांच अप्रेल का दिन कांग्रेस के लिए अलार्मिंग रहा। कांग्रेस के गढ़ रहे बीकानेर में जिस तरह से कांग्रेस के नेता गोविंद मेघवाल ने जनसभा में अपने समकालीन नेताओं के 'कच्चे चिट्ठे खोले। ऐसा लगने लगा है कि अगर समय रहते प्रदेश नेतृत्त्व ने कुछ नहीं किया तो स्थितियां संभाले नहीं संभलेगी। राजनीतिक गलियारों में तो यह चर्चा है कि नेताओं को एक्सपोज करने का यह काम भी शह पर हुआ था।
प्रदेश के नेताओं को पता था कि बीकानेर में क्या चल रहा है। गोविंद मेघवाल की तरफ से आहूत 'संगठन बढ़ाओ, देश लोकतंत्र बचाओ को देहात और शहर कांग्रेस पार्टी का कार्यक्रम नहीं माना गया था, लेकिन फिर भी यह गोविंद मेघवाल का नहीं, कांग्रेस का कार्यक्रम हुआ। होर्डिंग्स पर कांग्रेस के नेताओं के फोटो लगे थे और झंडे भी कांग्रेस के ही लहरा रहे थे। यह दीगर है कि कांग्रेस बढ़ी या पिछड़ी, लेकिन कांग्रेस का आंतरिक लोकतंत्र खूब मुखर हुआ।
गोविंद मेघवाल ने बहुत ही होशियारी से इस जनसभा को किसी एक जाति या समाज की नहीं होने दिया बल्कि बार-बार खुद को 36 कौम का नेता बताया। जाट समाज के कई नेताओं को मंच पर बिठाया, जिससे यह संदेश गया कि गोविंद सभी को साथ लेकर चलते हैं। पांच तारीख को हुई इस जनसभा के बाद से सन्नाटा छाया हुआ है। प्रदेश से भी किसी तरह का एक्शन या प्रतिक्रिया सामने नहीं आई।
इस पूरे प्रकरण में पहले जहां माहौल एकतरफा लग रहा था। ऑडियो-वीडियो वायरल होने के बाद गोविंद मेघवाल जहां बैक-फुट पर नजर आ रहे थे, वहीं पांच अप्रेल के बाद गोविंद मेघवाल अपर-हैंड के साथ नजर आ रहे हैं। भाजपा वाले इस बात पर खुश हैं कि उन्हें कांग्रेस की फूट का लाभ मिलेगा। इधर देहात और शहर कांग्रेस अध्यक्ष आशंकाओं से ग्रसित हैं कि उनकी लीडरशिप फेलियर साबित हो चुकी है।
भाजपा के सांसद और केंद्रीय मंत्री अर्जुनराम मेघवाल इस राजनीति में पड़े बगैर कोलकाता में चुनाव प्रचार करते नजर आ रहे हैं। रविशेखर मेघवाल ने जरूर पहले अपना नाम घसीटने पर प्रतिक्रिया दी, लेकिन फिर इस मसले से खुद को अलग कर दिया। वहीं दूसरी ओर देवीसिंह भाटी ने प्रशासन पर 'प्रेशर-पॉलिटिक्स के लिए अल्टीमेटम दिया, लेकिन फिर बातचीत से बात बन गई। एसपी मृद्ल कच्छावा की बॉडी-लेंग्वेज से लग रहा था कि वे स्थितियों को संभाल चुके हैं। देखना यह है कि कोलायत में जिन पुलिसवालों की तैनाती होती है, उन्हें वापस कब तक बुलाया जाता है।
मौसम का बदला हुआ मिजाज पतंगबाजों के लिए वरदान बना हुआ है। बीकानेर नगर स्थापना दिवस पर पतंगबाजी का शगुन अब शौक में बदल चुका है। बीकानेर में पतंग-मांझे का बड़ा बाजार है। इस बीच चायनीज मांझे ने लोगों को घायल करना शुरू कर दिया है। इस बार पतंगबाजों के लिए छते मुफीद नहीं रही है, क्योंकि छतों के बड़े हिस्से को सोलर प्लेट्स ने घेर लिया है। विकास को अपनी कीमत चुकानी पड़ती है। राजस्थानी में कहावत भी है कि या तो 'सीरो रंधा ले या लांग बंधा ले। अप्रेल के पहले पखवाड़े में मौसम सुहाना ही रहने की संभावना है।
ईरान-इजराइल युद्ध का असर सीएनजी से लेकर खाद्य सामग्रियों तक पडऩे लगा है। महंगाई बढ़ती जा रही र्है। हालांकि, नये जिला कलेक्टर निशांत जैन ने एलपीजी आदि की उपलब्धता पर फीडबैक लिया है, लेकिन बाजार को नियंत्रित करना जब मंत्रियों के वश में भी नहीं रहा तो अधिकारी क्या ही कर लेंगे।
गंगाशहर में एक युवक धीरज ललवाणी की आत्महत्या का प्रकरण हो चाहे खाजूवाला में जसप्रीत नाम की महिला की हत्या का मामला, हमारे सामाजिक ढांचे के चरमरा जाने के उदाहरण हैं। धीरज ने तो सुसाइड नोट घर के बाहर खंभे पर चिपका दिया, लेकिन उसे ऐसा करते किसी ने नहीं देखा। जसप्रीत हरप्रीत की पत्नी थी। हरप्रीत ने उसका गला घोंट कर मार डाला और फिर थाने में समर्पण कर दिया। आखिर समाज को हो क्या रहा है।
इस बीच कैंसर का एक मरीज प्रेमाराम अपने वार्ड से निकल गया, जिसकी लाश दो दिन बाद मिली। कोई नहीं जानता कि इस घटनाओं के पीछे क्या-क्या कहानी रही है। इस बीच मेडिकल कॉलेज के पास एक युवक को सरेराह पीटने का विडियो वायरल हो रहा तो चौखूंटी क्षेत्र में झगड़े के दौरान हथियार तक दिखाई दे रहे हैं।
सवाल उठता है कि क्या कानून-व्यवस्था का किसी को डर भी है या नहीं। और तो और साइबर क्राइम के मामले मेंं बड़ी-बड़ी गुत्थियां सुलझा लेने वाली पुलिस मुख्य डाकघर को तीसरी बार बम से उड़ा देने की धमकी देने वाला आइपी एड्रेस ट्रेस नहीं कर पा रही है। कहें तो किसे कहें। बकौल जावेद अख्तर—
कहने को बहुुत कुछ है मगर किस से कहें हम
कब तक यूं ही सहें और खामोश रहे हम
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